सिरमौर गैस संकट: 45 दिन का नियम बना ग्रामीणों के लिए मुसीबत, पर्याप्त स्टॉक के बावजूद खाली हैं रसोई

सिरमौर गैस संकट: 45 दिन का नियम बना ग्रामीणों के लिए मुसीबत, पर्याप्त स्टॉक के बावजूद खाली हैं रसोई

45-Day Rule Becomes a Hardship for Villagers

45-Day Rule Becomes a Hardship for Villagers

सिरमौर। 45-Day Rule Becomes a Hardship for Villagers, जिला सिरमौर के ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई गैस को लेकर अजीब स्थिति पैदा हो गई है। ताजा हालात ये हैं कि गैस एजेंसियों में सिलेंडर का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, लेकिन 45 दिन के नियम के चलते उपभोक्ताओं को समय पर गैस नहीं मिल पा रही। यही वजह है कि अब गांवों में भी गैस को लेकर संकट जैसे हालात बनने लगे हैं और लोग परेशान हो रहे हैं।

बता दें कि नए नियम के अनुसार भारत सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार सिलेंडर की डिलीवरी के बाद अगली बुकिंग 45 दिनों से पहले नहीं की जा सकती, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह अंतर सिर्फ 25 दिन का है।

कालाबाजारी और पैनिक बुकिंग रोकने के उद्देश्य से बनाए गए इस नियम का उल्टा असर अब सामने आ रहा है, जहां जरूरतमंद उपभोक्ताओं को ही गैस से वंचित होना पड़ रहा है। जिला सिरमौर में 1.62 लाख घरेलू गैस कनेक्शन हैं और 16 सरकारी व निजी एजेंसियां उपभोक्ताओं को सप्लाई देती हैं। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में लोगों को गैस के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

 

45 दिन का नियम व्यवहारिक नहीं

खासकर वे गांव, जो अब कस्बों का रूप ले चुके हैं और जहां बड़ी संख्या में नौकरीपेशा लोग रहते हैं, वहां स्थिति और ज्यादा गंभीर बन गई है। नाहन के पास जमटा इसका ताजा उदाहरण है, जहां 10 फरवरी को आखिरी बार गैस सप्लाई हुई थी और इसके बाद अब तक सिलेंडर नहीं पहुंचा। ऐसे में लोगों को मजबूरी में वैकल्पिक इंतजाम करने पड़ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आज के समय में गांवों की बड़ी आबादी एलपीजी पर निर्भर है, ऐसे में 45 दिन का नियम व्यवहारिक नहीं है।

उल्लेखनीय है कि स्वच्छ ईंधन, धुएं से मुक्ति और चूल्हा-मुक्त रसोई के नाम पर पहले भारत सरकार ने वर्षों तक गांव-गांव अभियान चलाया। यही नहीं महिलाओं को मुफ्त सिलेंडर भी बांटे। अब जब कई गांवों में लोग एलपीजी पर निर्भर हो गए, तो मिडिल ईस्ट के घमासान के बीच सरकार ने ग्रामीणों के लिए ये नियम बनाकर नई दुविधा खड़ी कर दी है। वहीं अधिकारी भी इस नियम के आगे लाचार नजर आ रहे हैं।

प्रशासन का ढुलमुल रवैया?

यह मामला सिर्फ एक जिले की आपूर्ति समस्या नहीं, बल्कि उस नीतिगत असंतुलन को उजागर करता है, जिसमें सरकार ने ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक चूल्हों से तो बाहर निकाल दिया, लेकिन उन्हें आधुनिक ईंधन व्यवस्था में समान और व्यावहारिक पहुंच नहीं दे सकी। मौजूदा समय में बड़ी संख्या में गांव आज अर्ध-शहरी स्वरूप ले चुके हैं, जहां नौकरीपेशा परिवार, छात्र, बुजुर्ग और एलपीजी पर पूरी तरह निर्भर गृहस्थियां रहती हैं।

यानी नीति अब भी पुराने गांव को देख रही है, जबकि गांव की वास्तविकता बदल चुकी है। वहीं लोगों ने प्रशासन, सरकार और तेल कंपनियों से मांग की है कि कम से कम उपभोक्ताओं के बुकिंग ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर राहत दी जाए। यदि पूरी तरह छूट संभव नहीं है, तो कम से कम आंशिक तौर पर सप्लाई सुनिश्चित की जाए, ताकि लोगों को राहत मिल सके।

उधर जिला सिरमौर के डीएफएससी शमशेर सिंह ने माना कि इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। जमटा जैसे बड़े गांवों में 45 दिन से पहले सप्लाई देने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखा गया है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि गैस की कोई कमी नहीं है और एजेंसियों में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। विभाग इस समस्या को गंभीरता से देख रहा है